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पाकिस्तानी सेना में जाने वाले थे सैम बहादुर|क्या भारत हार जाता 1971 की जंग ?

सैम बहादुर जी की कहानी कैसे गोलिया खाकर भी हस्ते थे

 सैम हॉरमुसजी फेमजी जमशेदजी उर्फ सैम बहादुर

साल 1947 में भारत और पाकिस्तान का त्रासदीपूर्ण विभाजन हुआ। हर एक चीज बंटी। जमीन, दफ्तर, कुर्सी-मेज से लेकर फौज तक। आंकड़े बताते हैं कि ब्रिटिश-भारतीय सेना में करीब चार लाख सैनिक थे। इनमें से लगभग दो लाख 60 हजार जवान भारतीय सेना का हिस्सा बने। इन्हीं में एक थे, अमृतसर के एक पारसी परिवार में जन्मे सैम मानेकशॉ।

मानेकशॉ जब ब्रिटिश फौज में लेफ्टिनेंट कर्नल थे, तो साल 1942 में बर्मा के मोर्चे पर जापान के खिलाफ उन्होंने अद्भुत वीरता प्रदर्शन किया। वह जंग में मशीनगन की गोलियों की चपेट में आ गए, फिर भी लड़ाई नहीं छोड़ी। उनकी बहादुरी के किस्सों से पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी अनजान नहीं थे।

मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तानी सेना में होने का offer दिया था

जिन्ना बंटवारे के बाद अपने मुल्क को मजबूत करने के लिए तमाम प्रतिभाशाली लोगों को अपने पाले में करना चाहते थे। उन्हें मालूम था कि मानेकशॉ जैसे अफसर की अगुवाई में पाकिस्तान की सेना एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंच सकती है। यही वजह थी कि उन्होंने मानेकशॉ से मुलाकात की और उनसे पाकिस्तान की फौज में शामिल होने की गुजारिश की।

सैम बहादुर के लिए भी पाकिस्तान की सेना में शामिल होना करियर के लिहाज से फायदे का सौदा था। उस वक्त ब्रिटिश भारतीय सेना के सभी वरिष्ठ पदों पर ब्रिटिश अफसर बैठे हुए थे।

उनके हटने के बाद भारतीय लोगों को नियुक्त किया जा रहा था। सभी अधिकारियों को एक फॉर्म मिला, जिस पर उन्हें अपनी पसंद दर्ज करनी थी कि वे भारतीय सेना में रहना चाहते हैं, या फिर पाकिस्तान की।

ज्यादातर हिंदुओं और सिखों के पास कोई विकल्प नहीं था। मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित नहीं लग रहा था।

तो उन्होंने भारत को चुना। ईसाई और पारसी सैनिकों ने भी यही किया। यहां तक कि जिन मुस्लिमों के घर भारत में थे, उनमें से भी ज्यादातर ने पाकिस्तान जाने क बजाय धर्मनिरपेक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष सेना को ही चुना।

ऐसे में पाकिस्तान की सेना में अच्छे अधिकारियों का अकाल पड़ गया। यही वजह थी कि जिन्ना ने मानेकशॉ के सामने पाकिस्तानी फौज में शामिल होने का प्रस्ताव रखा, क्योंकि वह उनकी काबिलियत से वाकिफ थे। मानेकशॉ के लिए पाकिस्तान में जल्दी तरक्की करने की गुंजाइश भी थी। लेकिन, मानेकशॉ ने अच्छे करियर की बजाय मातृभूमि को चुना। उन्होंने न सिर्फ जिन्ना के अनुरोध को ठुकराया, बल्कि 1947-48 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध भी लड़ा।

फिर जब साल 1971 में पाकिस्तान के साथ जंग हुई, तो मानेकशॉ ने अपना असली पराक्रम दिखाया और भारतीय उपमहाद्वीप का राजनीतिक नक्शा बदल दिया। उन्हीं की रणनीति थी, जिससे पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को सरेंडर करना पड़ा। और पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बना, बांग्लादेश।

 

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